बॉम्बे हाईकोर्ट ने एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाते कहा कि एसआईआर से लग रहा है कि धारा 22 को प्रभावी रूप से रोक दिया गया है। उनकी जगह सॉफ्टवेयर सिस्टम लागू किया जा रहा है। चुनाव आयोग ऐसा कैसे कर सकता है। कानून सबसे ऊपर है।
अदालत ने बुधवार को लगातार दूसरे दिन चुनाव आयोग को मतदाता सूचियों के एसआईआर के काम को लेकर कड़ी फटकार लगाई है। इससे एक दिन पहले ही मंगलवार को कोर्ट ने आयोग को गोवा के एक परिवार के छह सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने के लिए कड़ी आलोचना की थी, जबकि उन्होंने ‘फॉर्म 8’ जमा किया था। कोर्ट ने चुनाव आयोग को उसके खराब सॉफ़्टवेयर के लिए फटकार लगाई थी। आयोग ने कहा था कि यह सॉफ़्टवेयर एसआईआर के डेटा इकट्ठा करने के चरण के दौरान ‘फॉर्म 8’ के आवेदनों (पता बदलने की जानकारी) को प्रोसेस करने में सक्षम नहीं था।
याचिकाकर्ता परेश सालगांवकर और उनके परिवार के पांच सदस्यों ने बताया कि एसआईआर शुरू होने से पहले ही वे उसी चुनाव क्षेत्र में एक नए घर में चले गए थे। बूथ लेवल ऑफिसर ने उन्हें इसकी जानकारी अपडेट करने के लिए ‘फॉर्म 8’ जमा करने को कहा था। जब इन फ़ॉर्म को प्रोसेस किया जा रहा था, तो याचिकाकर्ताओं के ‘इलेक्टर्स फ़ोटो आइडेंटिटी कार्ड’ का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला, जिसके कारण उनके नाम लिस्ट से हटा दिए गए।
इस मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में कानून और नियम सबसे ऊपर हैं, सॉफ्टवेयर नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि एसआईआर के दौरान ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती, जिससे जनप्रतिनिधि कानून, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के प्रावधान प्रभावी रूप से निलंबित हो जाएं।
बॉम्बे हाईकोर्ट की पणजी पीठ में जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और अमित जामसंदेकर की डिवीजन बेंच गोवा के सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र के एक परिवार के छह सदस्यों के नाम एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटा दिए जाने से संबद्ध मामले की सुनवाई कर रही थी।
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील गौरीश अग्नि ने अदालत को बताया कि एसआईआर की एन्युमेरेशन प्रक्रिया के दौरान सिस्टम फॉर्म 8 को प्रोसेस करने की अनुमति नहीं देता था। आयोग के मुताबिक, परिवार को बाद में नए मतदाता के रूप में शामिल होने के लिए फॉर्म 6 भरने को कहा गया था, लेकिन परिवार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने सवाल किया कि अगर फॉर्म 8 कानून में मौजूद है और परिवार ने तय समय में उसे जमा भी किया था, तो सिर्फ इसलिए उसे क्यों नहीं माना गया क्योंकि चुनावी सॉफ्टवेयर उसे स्वीकार नहीं कर रहा था। पीठ ने सवाल उठाया कि “यह आपके सॉफ्टवेयर की समस्या है”, तो इसका नतीजा यह कैसे हो सकता है कि मतदाताओं के नाम ही सूची से गायब हो जाएं।
पिछली सुनवाई के दौरान भी अदालत ने इसी मामले में चुनाव आयोग से पूछा था कि परिवार के सदस्य अपना नाम मतदाता सूची में बनाए रखने के लिए कौन-सा फॉर्म भरें। उस समय आयोग ने अदालत को बताया था कि एक बार नाम हट जाने के बाद सिस्टम उसे उसी प्रक्रिया के तहत वापस बहाल करने की अनुमति नहीं देता।
इस पर अदालत ने चुनाव आयोग से समाधान तलाशने को कहा था और टिप्पणी की थी कि “पूरा देश” इस तरह की समस्या का सामना कर रहा है और आयोग को इसका रास्ता निकालना होगा।
बुधवार की सुनवाई में हाईकोर्ट ने इससे आगे बढ़कर एसआईआर की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि एसआईआर की प्रक्रिया के कारण ऐसा लग रहा है कि जनप्रतिनिधि कानून की धारा 22 और संबंधित नियमों को प्रभावी रूप से रोक दिया गया है, जबकि उनकी जगह सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली को लागू किया जा रहा है। पीठ ने सवाल किया कि चुनाव आयोग ऐसा कैसे कर सकता है कि कानून कहता कुछ हो और सॉफ्टवेयर की सीमाओं के कारण अधिकारियों को कुछ और करना पड़े।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ईआरओ के पास सॉफ्टवेयर पर आवश्यक अधिकार होना चाहिए। ईआरओ को किसी तीसरे व्यक्ति या केवल सॉफ्टवेयर के निर्देशों पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
पीठ ने कहा कि ईआरओ के पास सॉफ्टवेयर की “चाबी” होनी चाहिए, ताकि वह अपने वैधानिक आदेश के अनुसार नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने की कार्रवाई कर सके। अदालत के मुताबिक, यदि ईआरओ किसी तकनीकी सिस्टम के आदेशों पर निर्भर और असहाय हो जाए तो यह उचित व्यवस्था नहीं है।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान जोर देकर कहा कि पहले कानून का पालन होगा और उसके बाद तकनीक की भूमिका आएगी।अदालत ने कहा कि पूरी व्यवस्था को मतदाता के हित में काम करना चाहिए। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि कोई पात्र मतदाता मतदाता सूची से बाहर न रह जाए।
पीठ ने यह भी सवाल किया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम हटाया जाना है तो उसे पहले सुनवाई का अवसर क्यों नहीं दिया जाता।अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर देना कानून की मूल आवश्यकता है।
चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि एसआईआरके दौरान फॉर्म 8 को प्रोसेस नहीं किया जा सकता था और उस अवधि में नामों में बदलाव नहीं किया गया।
इस पर हाईकोर्ट ने इस तर्क पर गंभीर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि एसआईआर को इस तरह नहीं चलाया जा सकता कि उसके कारण मौजूदा कानून और नियमों को कुछ समय के लिए किनारे कर दिया जाए।
पीठ ने कहा कि एसआईआर अपने आप में कानून से अलग कोई स्वतंत्र प्रक्रिया नहीं हो सकती। अदालत के अनुसार एसआईआर को संबंधित नियमों और कानून के प्रावधानों के अनुरूप ही चलना होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनावी पुनरीक्षण चाहे जितनी बार किया जाए, वह ऐसी स्थिति पैदा नहीं कर सकता जिसमें मतदाता फॉर्म 6, फॉर्म 7 या फॉर्म 8 के माध्यम से मिलने वाले अपने वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल ही न कर सके।
छह मतदाताओं के नाम हटने के मामले को लेकर अदालत ने एक बड़ा सवाल भी उठाया। पीठ ने कहा कि जब ये छह लोग अदालत तक पहुंच गए हैं तो यह पता लगाना जरूरी है कि ऐसे कितने और मतदाता हैं, जिनके नाम हट गए लेकिन वे अदालत तक नहीं पहुंच पाए। यही चिंता इस मामले को केवल एक परिवार की समस्या से आगे ले जाती है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि तकनीकी व्यवस्था के कारण बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं, तो चुनाव आयोग को इस व्यवस्था की समीक्षा करनी होगी।
आयोग के वकील ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग की किसी मतदाता का नाम जानबूझकर हटाने की मंशा नहीं थी।लेकिन अदालत ने इसके जवाब में मूल कानूनी प्रक्रिया पर जोर दिया। पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम हटाने से पहले उसे सुनवाई का अवसर देना जरूरी है।
गोवा में एसआईआर के दौरान सॉफ्टवेयर से जुड़ी दूसरी शिकायतों को लेकर भी विवाद हुआ है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने पहले 97 ऐसे मतदाताओं के मामलों पर स्पष्टीकरण दिया था जिनके नाम अंतिम सूची में नहीं थे और कहा था कि पात्र मतदाताओं को फिर से शामिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)